क़ानूनी · कोर्ट फ़ीस
पैसे के मुक़दमे पर कोर्ट फ़ीस
पैसे वसूलने के लिए दीवानी मुक़दमा करना है? कोर्ट फ़ीस दावे की रकम का एक हिस्सा है, जो हर राज्य का कोर्ट फ़ीस अधिनियम तय करता है। राज्य और रकम चुनें।
आख़िरी अपडेट: IndiaDigital संपादकों द्वारा जाँचा गयास्रोत
Maharashtra Court-fees Act, 1959, Schedule I Article 1
कैसे: ₹1 लाख से ₹11 लाख: ₹6,430 + ₹200 हर ₹10 हज़ार या उसके हिस्से पर, सीमा ₹1 लाख
- अधिकतम ₹3 लाख। 2017 का संशोधन (सीमा ₹10 लाख) 2018 में छपा पर 2024 के आधिकारिक पाठ तक लागू नहीं हुआ; लागू होने की अधिसूचना नहीं मिली।
दूसरे राज्यों में ₹5 लाख पर फ़ीस
* आधिकारिक स्रोत से पुष्टि नहीं।
यह कैसे काम करता है
- हर राज्य के कोर्ट फ़ीस अधिनियम की अनुसूची I, अनुच्छेद 1 (पैसे के मुक़दमे का वाद-पत्र) इस्तेमाल होती है, हर स्लैब के साथ, न्यूनतम और अधिकतम सीमा भी।
- "हर ₹5,000 या उसके हिस्से पर ₹100" जैसे नियम अनुसूची के अनुसार ऊपर की ओर गोल होते हैं।
- जहाँ आधिकारिक स्रोत से अनुसूची की पुष्टि नहीं हुई, राज्य पर निशान है; पश्चिम बंगाल और पंजाब के लिए हम कोई आँकड़ा नहीं दिखाते।
- उपभोक्ता केस अलग हैं: ई-जागृति पर ₹5 लाख तक कोई फ़ीस नहीं। चेक बाउंस, पारिवारिक और रिट की फ़ीस भी अलग है।
लोग पूछते हैं
क्या दीवानी मुक़दमे से सस्ता रास्ता है?
किसी व्यापार या व्यक्ति से पैसा लेना हो तो पहले क़ानूनी नोटिस, फिर लोक अदालत या मध्यस्थता आज़माएँ (ज़्यादातर राज्यों में वहाँ समझौता होने पर फ़ीस लौटती है)। उपभोक्ता शिकायत और MSME के बकाया भुगतान के दावों के अपने कम ख़र्च वाले मंच हैं।
आख़िर में कोर्ट फ़ीस कौन देता है?
दाख़िल करते समय आप देते हैं। जीतने पर अदालत दूसरे पक्ष से आपका ख़र्च, कोर्ट फ़ीस सहित, दिलवा सकती है।
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