अगर अपराध संज्ञेय है (चोरी, मारपीट, धोखाधड़ी, यौन अपराध, साइबर ठगी और ज़्यादातर गंभीर अपराध), तो थाना प्रभारी को उसे दर्ज करना होगा। आप किसी भी थाने जा सकते हैं, भले घटना कहीं और हुई हो (ज़ीरो FIR), या ऑनलाइन बताकर तीन दिन में हस्ताक्षर कर सकते हैं (ई-FIR)। कॉपी मुफ़्त मिलती है। फिर भी मना करें तो शिकायत लिखकर डाक से पुलिस अधीक्षक (SP) को भेजें, फिर मजिस्ट्रेट के पास आवेदन दें।
संज्ञेय अपराध की सूचना थाने को दर्ज करनी ही होगी। सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी (2013) में भी यही कहा। 3 से 7 साल की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस DSP की मंज़ूरी से पहले 14 दिन तक प्रारंभिक जाँच कर सकती है।
BNSS 173(1), 173(3)
ज़ीरो FIR: किसी भी थाने में
क़ानून में अब साफ़ लिखा है कि सूचना "अपराध जिस भी क्षेत्र में हुआ हो" दी जा सकती है। थाना उसे दर्ज कर सही थाने भेजता है।
BNSS 173(1)
ई-FIR: ऑनलाइन सूचना
आप इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना दे सकते हैं। तीन दिन के अंदर हस्ताक्षर करने पर वह रिकॉर्ड में ली जाती है। ज़्यादातर राज्यों में इसके लिए ई-FIR या नागरिक पोर्टल है।
BNSS 173(1)(ii)
कॉपी मुफ़्त और तुरंत
FIR की कॉपी आपको या पीड़ित को तुरंत और मुफ़्त देनी होगी।
BNSS 173(2)
यौन अपराध की पीड़ित महिलाएँ
बयान महिला पुलिस अधिकारी दर्ज करती है। पीड़िता दिव्यांग हो तो उसके घर या उसकी चुनी जगह पर, दुभाषिए या विशेष शिक्षक के साथ, वीडियो रिकॉर्डिंग में।
BNSS 173(1) परंतुक
जाँच की जानकारी
पुलिस को 90 दिन के अंदर सूचना देने वाले या पीड़ित को जाँच की प्रगति बतानी होगी।
BNSS 193(3)(ii)
क्या करें, कदम दर कदम
पहले लिख लें
तारीख़, समय, जगह, क्या हुआ, किसने किया (या उसका हुलिया), गवाह, नुकसान। छोटा और तथ्यों पर। हमारे ड्राफ़्ट मदद करेंगे: साइबर ठगी, मोबाइल गुम, दस्तावेज़ गुम।
नज़दीकी थाने जाएँ या ऑनलाइन बताएँ
थाना प्रभारी (SHO) से मिलें। सिर्फ़ "रसीद" या एंट्री नहीं, FIR माँगें। साइबर ठगी हो तो तुरंत 1930 भी मिलाएँ।
मुफ़्त कॉपी और FIR नंबर लें
हस्ताक्षर से पहले देख लें कि आपकी बात सही लिखी गई है।
मना करें तो SP को लिखें
शिकायत का सार लिखकर डाक से (रसीद रखें) पुलिस अधीक्षक या कमिश्नर को भेजें। SP को ख़ुद जाँच करनी होगी या करवानी होगी।
फिर भी कुछ न हो तो मजिस्ट्रेट
न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास शपथ पत्र के साथ आवेदन दें और बताएँ कि आप SP के पास गए थे। मजिस्ट्रेट पुलिस को जाँच का आदेश दे सकते हैं। मुफ़्त क़ानूनी सहायता यह आवेदन आपके लिए दाख़िल कर सकती है (15100 मिलाएँ)।
असंज्ञेय मामला?
छोटे अपराधों में पुलिस रजिस्टर में एंट्री (अक्सर NCR कहते हैं) करके आपको मजिस्ट्रेट के पास भेजती है। एंट्री नंबर ज़रूर लें।
नए आपराधिक क़ानून 1 जुलाई 2024 से लागू हैं। पुराने मामले पुरानी धाराओं में चलते रहेंगे।
पुरानी (IPC/CrPC)
अब (BNS/BNSS)
विषय
CrPC 154
BNSS 173
संज्ञेय अपराध की FIR
CrPC 154(3)
BNSS 173(4)
FIR से मना करने पर SP को शिकायत
CrPC 155
BNSS 174
असंज्ञेय मामले
CrPC 156(3)
BNSS 175(3)
मजिस्ट्रेट का जाँच आदेश
IPC 166A
BNS 199
लोक सेवक का सूचना दर्ज न करना
IPC 420
BNS 318
धोखाधड़ी
IPC 379
BNS 303
चोरी
यह सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। क़ानून और राज्य के नियम बदलते रहते हैं; आधिकारिक स्रोत देखें या वकील से पूछें। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: NALSA 15100 मिलाएँ या अपने ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण जाएँ।
लोग पूछते हैं
क्या पुलिस यह कहकर मना कर सकती है कि घटना दूसरे इलाक़े की है?
नहीं। BNSS 173(1) के अनुसार सूचना किसी भी थाने में दी जा सकती है, अपराध कहीं भी हुआ हो। वे ज़ीरो FIR दर्ज करके उसे ट्रांसफ़र करते हैं।
FIR न लिखने पर पुलिसकर्मी को सज़ा होती है?
महिलाओं के ख़िलाफ़ कुछ अपराधों (जैसे बलात्कार, एसिड हमला) में सूचना दर्ज न करने वाले लोक सेवक को BNS 199 में सज़ा हो सकती है, जो पुरानी IPC 166A की जगह है।
FIR और मजिस्ट्रेट के पास शिकायत में क्या फ़र्क़ है?
FIR से पुलिस जाँच शुरू होती है। मजिस्ट्रेट के पास शिकायत आपका अपना अदालती मामला है; मजिस्ट्रेट BNSS 175(3) में पुलिस को जाँच का आदेश भी दे सकते हैं।