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पावर ऑफ़ अटॉर्नी, विदेश से, सही तरीक़े से।
पावर ऑफ़ अटॉर्नी से भारत में कोई आपकी तरफ़ से काम कर सकता है: फ़्लैट बेचना, बैंक या कोर्ट का काम। ग़लत बनी तो रजिस्ट्रार मना कर देता है। इन्हें क्रम से पूरा करें।
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क्रम से ज़रूरी बातें
- एक काम के लिए स्पेशल पावर ऑफ़ अटॉर्नी चुनें, जैसे एक तय फ़्लैट बेचना। जनरल वाली ज़्यादा बड़ी है और उसमें जोखिम भी ज़्यादा है।
- पूरी जानकारी लिखें: आपका नाम और पासपोर्ट, एजेंट का नाम और पहचान पत्र, प्रॉपर्टी या खाता, वह ठीक-ठीक क्या कर सकता है और कब तक।
- विदेश में भारतीय मिशन के कॉन्सुलर अधिकारी के सामने साइन करें, या वहाँ के नोटरी के सामने साइन करके अपोस्टिल लगवाएँ अगर देश हेग कन्वेंशन में है।
- भारत पहुँचने के 3 महीने के अंदर कलेक्टर या सब-रजिस्ट्रार के पास स्टांप ड्यूटी भरें (भारतीय स्टांप अधिनियम, धारा 18; राज्यों की दरें अलग हैं)।
- प्रॉपर्टी बेचने या ख़रीदने के लिए इसे रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1908 (धारा 32 और 33) के हिसाब से रजिस्टर या प्रमाणित करवाएँ, और अपने राज्य के नियम देख लें।
- पावर ऑफ़ अटॉर्नी बिक्री नहीं है। सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि सिर्फ़ रजिस्टर्ड सेल डीड से ही प्रॉपर्टी ट्रांसफ़र होती है।
- काम पूरा होने पर इसे लिखकर रद्द करें और बैंक या रजिस्ट्रार को बताएँ।
लोग पूछते हैं
भारतीय मिशन या अपोस्टिल: कौन सा बेहतर है?
कई राज्यों में दोनों माने जाते हैं। साइन करने से पहले उस सब-रजिस्ट्रार या बैंक से पूछ लें जहाँ इसका इस्तेमाल होगा।
क्या बैंक जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी मानते हैं?
कई बैंकों का अपना मैंडेट या पावर ऑफ़ अटॉर्नी फ़ॉर्मेट होता है। पहले अपने बैंक से पूछें।
क्या दो लोगों को दे सकते हैं?
हाँ। लिखें कि वे अकेले काम कर सकते हैं या दोनों को साथ करना होगा।
स्रोत
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